Thursday, February 4, 2010

अन्नदाता के सवाल


देश में खेती और किसानों ने आजादी के बाद काफी तरक्की की है। आने वाले सालों में खेती के क्षेत्र में और ज्यादा विकास के लिए कोशिशें की जा रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने भी दूसरी हरित क्रांति की ज़रूरत बताई है। खेती और हमारे अन्नदाता किसानों के लिए सरकार ने कई ऐसे काम किए हैं जिन पर खुशी जाहिर की जा सकती है लेकिन कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब तलाशे जाना बाकी है। क्या वाकई हिंदुस्तान का किसान नई सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार है? क्या देश के ज्यादातर किसान आज के दौर में ज़रूरी सुख सुविधाओं का उपभोग कर पा रहे हैं? क्या हमारे किसान नई तकनीक का सही ढंग से उपयोग करने के लिए तैयार हैं? डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहता है। इंजीनियर अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहता है,यहां तक कि नेता भी अपने बेटे को नेता बनाना चाहते हैं लेकिन आखिर ऐसी क्या वजह है कि देश का किसान अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता। चंद अपवादों को छोड़ दें तो आज भी ज्यादातर किसान यही चाहते हैं कि उनकी आने वाली पीढ़ी खेती न करे। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इससे बड़ी विडंबना भला और क्या हो सकती है। हिंदुस्तान का किसान मेहनत करने से भी नहीं डरता लेकिन फिर भी खेती से मोहभंग हो रहा है। देश में खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ा और किसानों के जीवन स्तर में भी सुधार हुआ है लेकिन ये सुधार उतना असरदार नहीं है जितना व्यापारी, नेता या नौकरीपेशा लोगों के जीवन में आया है। किसानों के हाथ में आने वाला शुद्ध मुनाफा आज भी संतोषजनक नहीं है। आखिर किसानों के साथ इतनी समस्याएं क्यों हैं? मोटी सब्सिडी दी जाती है। हजारों करोड़ का कर्ज माफ किया जाता है फिर भी हालात में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आता। दरअसल हमारी सरकारों ने वोट की खातिर भोले भाले किसानों को झुनझुने तो खूब थमाए लेकिन उनके स्थायी विकास के लिए दूरदर्शिता के साथ कोशिशें नहीं की गई। आज देश में कितने ऐसे कृषि विश्वविद्यालय हैं जो गांव में चल रहे हैं। इन विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 95 फीसदी से ज्यादा (या इससे भी ज्यादा) छात्र खेती करने के लिए नहीं बल्कि कृषि विभाग में मालदार नौकरियां हासिल करने के लिए यहां आते हैं। ये हमारी नीतियों की खामियां नहीं तो और क्या है? कुछ ऐसे किसान जो बेहतरीन काम कर रहे हैं, लीक से हटकर काम करके मिसाल बन रहे हैं क्या उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विश्वविद्यालयों में कुछ विशेष तरह के कोर्स तैयार नहीं किए जा सकते। अच्छे पत्रकार मीडिया स्कूलों में गेस्ट लेक्चर के लिए जा सकते हैं, अच्छे कारोबारी बिजनेस स्कूलों में पढ़ाने जा सकते हैं भले ही उन्होंने इससे जुड़ा कोर्स किया हो या न किया हो तो फिर क्या वजह है कि सफल किसानों को ऐसा ही मौका कृषि विश्वविद्यालयों में नहीं दिया जाता। इन विश्वविद्यालयों में जो लोग पढ़ा रहे हैं उनमें से कितने ऐसे हैं जो किताबी खेती से ज्यादा जानते हैं। हमने अपने किसानों को उड़ने के लिए वो आकाश नहीं दिया जिसकी उन्हें ज़रूरत है। किसानों को सक्षम बनाने की बजाए कर्ज माफ करके हमारी सरकारों ने उन्हें मुफ्त का माल थमाने की परंपरा को आगे बढ़ाने में ही भलाई समझी। किसी को भी ये नहीं भूलना चाहिए कि हिंदुस्तान जैसे कृषि प्रधान देश में किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। अन्नदाता आगे नहीं बढ़ेगा तो पूरा सिस्टम चरमरा जाएगा।कई लोगों को ये समस्या और सवाल छोटे या बेवजह लग सकते हैं लेकिन हकीकत ये है कि यही हाल रहा तो हालात बद से बदतर हो जाएंगे। अब तो चुनौतियां और ज्यादा हैं आने वाले तकनीक के युग में किसानों को केवल आधुनिक मशीनें देने से काम नहीं चलेगा उन्हें इनका इस्तेमाल भी सिखाना होगा। शिक्षा का ऐसा सिस्टम बनाना होगा जिसमें किसान के लिए भी जगह हो। कृषि विश्वविद्यालयों के पूरे ढांचे को भी बदलना होगा, ताकि ये संस्थान कृषि विभाग के लिए सरकारी अफसर और बाबू नहीं बेहतरीन किसान तैयार करें। जाहिर है अगर ऐसी किसी परिकल्पना को साकार करना है तो देश के सुलझे हुए और शिक्षित किसानों (जो वाकई खेती कर रहे हैं)को नीति निर्माण में भी भागीदार बनाना होगा।

13 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत ज्‍वलंत सवाल उठाया है भाई आपने.
धन्‍यवाद.

प्रबल प्रताप सिंह् said...

wlecome in blogjagat...!!

शशांक शुक्ला said...

सही बात कही है

आमीन said...

सही सवाल उठाया

Dr.Aditya Kumar said...

शिक्षा का ऐसा सिस्टम बनाना होगा जिसमें किसान के लिए भी जगह हो। कृषि विश्वविद्यालयों के पूरे ढांचे को भी बदलना होगा, ताकि यहां ये संस्थान कृषि विभाग के लिए सरकारी अफसर और बाबू नहीं बेहतरीन किसान तैयार करें। जाहिर है अगर ऐसी किसी परिकल्पना को साकार करना है तो देश के सुलझे हुए और शिक्षित किसानों (जो वाकई खेती कर रहे हैं) को नीति निर्माण में भी भागीदार बनाना होगा।
good suggession.

सत्यप्रकाश आज़ाद said...

mujhe ek bat ka ashcharya hua. aap ne itana gambhir or bada masala uthaya lekin comment kewal ek wakya me aaya. desh ki 70% abadi gaon me rahati hai, krishi par nirbhar hai, agar inka vikas nahi huaa to desh vikas nahi kar sakta.

uthojago said...

relevant questions, which has no answers

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत अच्छे सवाल उठाए हैं आपने. सरकारों को इस दिशा में सोचना चाहिये कि किसान क्यों केवल कृषि मेलों तक ही सीमित कर दिया गया है.

Sitanshu said...

....हलांकि ये जानकर थोड़ा अचरज हुआ कि कृषि क्षेत्र और किसानों की दयनीय हालत में आप इस क़दर दिलचस्पी रखते हैं....भला आज की युवा पीढ़ी को इन चीजों के बारे में सोंचने और चर्चा करने का समय कहां..खैर, आपने अपनी लेखनी में किसानों से संबंधित कई मुद्दे उठाएं हैं...हर मुद्दे की अपनी गहराई है...अगर बात करें किसानों को उचित मेहनताना न मिलने की, तो हाल ही में जारी एक आंकड़े से ये साफ हो गया है, कि कृषि उत्पादों का ज्यादा मुनाफ़ा बिचौलिए खा रहे हैं..न कि किसान।
आंकड़ों से साफ होता है कि थोक बाज़ार में जो प्याज 4-6 रुपए प्रति किलोग्राम या फिर 400-600 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है...खुदरा बाज़ार में पहुंचते-पहुंचते उसका दाम 20-25 रुपए प्रति किलो हो जाता है। शक्कर की बात करते हैं... बाज़ार में पिछले साल जब शक्कर 16 रुपए प्रति किलो बिक रहा था...तो बिहार के चीनी मिल किसानों से 176 रुपए प्रति क्विंटल गन्ना खरीद रही थी...अब बाज़ार में शक्कर की कीमत 46 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई है..तो बिहार के चीनी मिल किसानों को गन्ने की कीमत 200 रुपए प्रति क्विंटल देने लगे हैं। ...मतलब साफ है.....किसान अपना गन्ना सस्ते में बेच रहे हैं...और उसी की बनी चीनी महंगी कीमत पर खरीद रहे हैं।..या फिर यूं कहें, कि सारा का सारा पैसा बिचौलियों के खातों में जा रहा है।...अब ये चीजें सरकार के समझ में क्यों नहीं आ रही है...ये चर्चा का विषय है।

संगीता पुरी said...

अच्‍छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्‍दी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

nishant said...

एक किसान का बेटा और पत्रकार होने के नाते इस लेख पर प्रतिक्रिया लिखते हुए मैं सोचने पर मजबूर हूं। आपने जायज़ सवाल उठाया किसान का बेटा, किसान होने पर फ़ख्र क्यों महसूस नहीं करता, शायद इस पेशे को सम्मान से देखना किसी ने ज़रूरी ही नहीं समझा। भले ही देश की इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा इससे आता हो, या फिर देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसकी अहम हिस्सेदारी हो।
लगातार बढ़ती महंगाई और खाद्यान्न की घरेलू मांग को पूरा नहीं कर पाने पर भले ही अब सरकार कृषि के गिरते स्तर पर चिंता जता रही है, लेकिन सरकार का एग्रीकल्चर सेक्टर को लेकर नकारात्मक रवैया चिंताजनक है। नई तकनीक की बात आपने सही कही, लेकिन संक्षिप्त में यही कहूंगा कि सरकारें किसानों को ये भरोसा दिलाएं कि मौजूदा हालात में भी बेहतर से बेहतर खेती की जा सकती है, पहले किसानों को उनका हक़ दिलाएं.. उनके परिवारों को बिखरने से रोकें.. पहले उनका भविष्य सवांरे, फिर सोचेंगे आख़िर किसान का बेटा किसान क्यों नहीं बन रहा।।

अच्छा लेख। शुभकामनाएं।

http://www.aapaskibaat-nishant.blogspot.com/

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

hamari duniya said...

वाह सर दिल की बाल कलम से निकली है , बहुत शुभकामनाएं इसी तरह लिखते रहिए , उम्मीद करता हूं की आप ब्लॉग की दुनिया में जल्द लोकप्रीयत के शिखर पर होगे , और मिट्टी की खुशबु लिए आपके लेख जल्द पढ़ने को मिलते रहेंगे
मिट्टी का जिस्म लेके मैं पानी के घर में हूँ
मंज़िल है मेरी मौत, मैं हर पल सफ़र में हूँ

होना है मेरा क़त्ल ये मालूम है मुझे
लेकिन ख़बर नहीं कि मैं किसकी नज़र में हूँ

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